सम साधना परम योग

एक अभ्यास जो मानव को साधना से चेतना तक की अद्भुत यात्रा पर ले जाता है। जब मनुष्य स्वयं को साधने के लक्ष्य के साथ इस परम यात्रा पर निकलता है तो इसकी शुरुआत अपने मन को साधने से करनी होती है।

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आपका स्वागत

परमधाम की सृष्टी संस्कार संरचना में आपका स्वागत है। महानुभाव जनों ईश्वर की सबसे अनुपम रचना हम सब अर्थात मानव को माना गया है। हमारी चेतना और बुद्धी ही हमें सब जीवों से अलग बनाती हैं। इस सतत विकास की प्रक्रिया में मनुष्य का अद्भुत योगदान रहा है लेकिन इस धरा के संतुलन को बिगाड़ने में भी मानव के विवेक हीन कार्य ही काफी हद तक जिम्मेदार हैं। इस बदलती जीवनशैली ने मानव और मानवता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। परमधाम संस्थान ने कई सालों तक जीवन सार और सृष्टी विकास पर गहन अध्ययन कर ये पाया कि भौतिक विकास को संपूर्ण विकास नहीं कहा जा सकता है। परमसुख और परमआन्नद के लिए हम सबको अपने बाहर और अपने अंदर परिवर्तन करना आवश्यक है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए सभ्य समाजिक संरचना ही उसके जीवन को सुखमय बना सकती है। स्वस्थ शरीर चैतन्य मन और मधुर रिश्तों के परीवेश में ही एक बेहतर जीवन की कल्पना की जा सकती है। परमधाम संस्थान द्वारा आयोजित शिक्षा, योग, साधना, आस्था और अनुशासित जीवनशैली जैसे कार्य लोगों के जीवन में सार्थक बदलाव ला रहे हैं। जन जन में जीवन सार की ये अलख जगाने की यात्रा में आपका हार्दिक स्वागत है।

सम साधना परम योग

एक अभ्यास जो मानव को साधना से चेतना तक की अद्भुत यात्रा पर ले जाता है।जब मनुष्य स्वयं को साधने के लक्ष्य के साथ इस परम यात्रा पर निकलता है तो इसकी शुरुआत अपने मन को साधने से ...

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अन्तर्निहित अन्नत यात्रा

मैं कौन हूं? यहां क्यूं हूं? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या मैं साधन हूं या फिर केवल साध्य मात्र हूं? मेरे मन में इतने प्रश्न क्यों हैं? इन प्रश्नों का उत्तर कहां मिलेगा? मनुष्य के अस्थिर मन में उठते इन सवालों का ...

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ना मैं गुरु ना तू शिष्य

हम सभी परम हैं, हम सभी विशिष्ट हैं इसलिए ना मैं गुरु ना तू शिष्य बस सहचर बन साथ चलना है। गुरु की करनी गुरु भरेगा और चेला की करनी चेला अर्थात गुरु चेला सब कर्म की निगाह में बिल्कुल समान हैं।...

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परमधाम विशेष सामग्री

शोध और अनुभव से संकलित ये ज्ञान पुंज, आपके लिए अब एक पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है।

वीडियो

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जीवन परिचय - परम गुरु राधेश्याम जी

परम गुरु राधेश्याम जी का जन्म 2 सितंबर 1985 को भारत के हरियाणा प्रांत के हिसार के सीसवाल गांव में हुआ। सीसवाल एक पवित्र तीर्थ स्थल है। महाभारत काल से भगवान शिव की अनुपम कृपा इस पावन जगह पर रही है। परम गुरु राधेश्याम जी का जन्म एक किसान परिवार में हुआ। दिव्य परिवेश में जन्मे राधेश्याम जी का अध्यात्म की दुनिया से परिचय उनके दादा जी ने करवाया। परिवार की पृष्ठभूमि पूरी तरह से धार्मिक आचरण वाली रही है। पांच भाई बहनों में राधेश्याम जी सबसे छोटे थे इसलिए सबका दुलार और स्नेह उन्हें भरपूर मिला,विशेषकर उनके दादा श्री मामराज जी का, जिन्होने बचपन में ही राधेश्याम जी को धार्मिक महत्व और आध्यात्म का ज्ञान देना शुरु कर दिया था। जिज्ञासु राधेश्याम जी भी इस ज्ञान गंगा की गहराई में उतरते ही चले गए । समय के साथ राधेश्याम जी की बढ़ती उम्र में ये ज्ञान कोष और भी विराट विशाल होता चला गया। अनवरत अध्ययन और जनसेवा की मंशा ने राधेश्याम जी को परम गुरु राधेश्याम जी के मुकाम पर पहुंचा दिया। कई सालों के शोध और तपस्या से अर्जित इस ज्ञान को परम गुरु अब पूरे विश्व को वापस लौटाने के पथ पर अग्रसर हैं।

लेटेस्ट ब्लॉग

अध्यात्म क्या है?

एक व्यापक धारणा के रूप में आध्यात्मिकता के विभिन्न दृष्टिकोणों हो सकते हैं। अक्सर हम सबके जीवन का एक उद्देश्य होता है जो कई बार साफ नजर नहीं आता है। आध्यात्मिकता उद्देश्य खोज के इस परिदर्शय से परिचय कराता है। आध्यात्मिकता पूरी तरह से एक अनुभूती एक अनुभव है जिसके मायने अलग अलग हो सकते हैं।

आध्यात्मिकता महत्वपूर्ण क्यों है?

ये जीवन का वो अभ्यास है जो आपके तन और मन में कई सार्थक बदलाव लाता है। ये सीधे तौर पर आपके स्वास्थ्य और सुखमय जीवन को एक नया आयाम प्रदान कर सकता है। इसे समझने के लिए तीन भागों में विभाजित करते हैं।

धर्म और आध्यात्मिकता

धर्म आपकी परंपरा रिवाजों से जुड़ा रहता है जिसका अनुसरण सदियों से किया जाता रहा है लेकिन आध्यात्मिकता पूरी रह से आपका व्यक्तिगत अभ्यास है जिसे सिर्फ आप स्वयं महसूस कर सकते हैं। धर्म एक बड़ी विचारधारा है तो आध्यात्मिकता उसका एक जरुरी अंश।